आभार
आज फिर तुम मेरे सामने आएमैंने निकट से देखातुम्हारा भव्य रूप।तुम्हारी ऊँचाई को नापतीमेरी ग्रीवा बिल्कुल पीछे मुड़ गईफिर भी, मैं गगन में घुल-मिल गईतुम्हारी अपनी इकाई को खोजती रहीतुम्हारे चट्टानी वक्ष पर उभरतीरेखाओं को देख कर सिहरती रहीचारों तरफ़ से घेरतातुम्हारे आधिपत्य का दायरामुझे आश्वासन देता रहाधूप-छाँव कीइस रंगमंचीय रोशनी में तुम मुझेअपने बदलते रंगों सेसम्मोहित करते रहे।
सूरज ने कुछ इस तरह घुमा कररोशनी फेंकी तुम परकि बर्फ़ से ढँकातुम्हारा शिखरचकाचौंध कर गया।मैं बस टकटकी लगा करदेखती रह गई।
फिर जैसे,देखना काफ़ी नहीं थाआँखों का क्या भरोसा?मन का क्या विश्वास?मैं छूना चाहती थी तुम्हेंदुस्साहस कर बैठी मैंऔर मैंने बढ़ा दियातुम्हारी ओरअपना हाथ।
मेरी क्षुद्रता,हवा में ही काँप कर रह गयामेरे हाथ।कहाँ तुमभव्य, विशाल, विराटऔर कहाँ मैंतुम्हारे ही अस्तित्व का एक भाग।
मैं अपनी तुच्छता को समेटेअपने छोटेपन के एहसास सेसंकुचितबैठी थी घुटनों पर सिर टिकाएलज्जित कि कैसे मैंने की हिमाकतसोचने की भीकि, मैं तुम्हें छू सकती हूँनिर्णय दे सकती हूँतुम्हारी स्थूलता का,तुम्हारे होने न होने का,आँकने का प्रमाण?लघु बुद्धि का मान?लज्जित, बहुत लज्जित थी मैं।
तभीएक छोटी-सीबर्फ़ की एक चिंदीमेरे माथे पर आकर गिरीजैसे मुझे मनाता, सहलानातुम्हारा शीतल चुंबन।मैंने चिबुक उठा कर देखातुम्हारी प्यार भरी आँखों मेंमुसकुरातातुम्हारी सक्षमता का भावहवाओं की बाहों से उठा करतुमने मेरे माथे पररख दिया था प्यार।
चारों तरफ़ हल्की-हल्कीबर्फ़ के फाहे गिरने लगेमैं तो तुम तक नहीं पहुँच सकीपर तुम मुझ तक पहुँचने लगेआभार,बहुत-बहुत आभार।
Saturday, September 19, 2009
Thursday, September 17, 2009

जो कष्ट दूसरे के हैं ओढ़ लिया करते''
जो कष्ट दूसरे के हैं ओढ़ लिया करतेवह कष्ट नहीं होता, आनन्द कहलाता है,कहने वाले कहते, वह पीड़ा भुगत रहाउस पीड़ा में भी वह मिठास ही पाता है।हम व्यक्ति राष्ट्र या फिर समाज के दुख बाँटे,अनुभूति नहीं फिर दुख की कोई भी करता''वह यही गर्व करता, मैं नहीं अकेली हूँ ...वह तो सुख का अनुभव करता, जो दुख हरता।हम अगर किसी का धन बाँटें, दुख पाएँगेहम कष्ट किसी के बाँटे, मन को सुख होगा,सुख के बाँटे सुख मिलता, दुख के बाँटे दुखयह नियम प्रकृति का अटल, न कभी विमुख होगा।
जो कष्ट दूसरे के हैं ओढ़ लिया करतेवह कष्ट नहीं होता, आनन्द कहलाता है,कहने वाले कहते, वह पीड़ा भुगत रहाउस पीड़ा में भी वह मिठास ही पाता है।हम व्यक्ति राष्ट्र या फिर समाज के दुख बाँटे,अनुभूति नहीं फिर दुख की कोई भी करता''वह यही गर्व करता, मैं नहीं अकेली हूँ ...वह तो सुख का अनुभव करता, जो दुख हरता।हम अगर किसी का धन बाँटें, दुख पाएँगेहम कष्ट किसी के बाँटे, मन को सुख होगा,सुख के बाँटे सुख मिलता, दुख के बाँटे दुखयह नियम प्रकृति का अटल, न कभी विमुख होगा।

सपने में रंग गई कान्हा के रंग''
सपने में रंग गई कान्हा के रंगतन में तरंग उठें, उर में उमंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखीनयनों की वर्षा से भीगी मैं सारीनेह पिचकारी कान्हा बार-बार मारीतन के तार झनझनाएँ, नाचे अंग-अंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखीफागुन के गुन बतलाऊँ कैसे मैं आलीअँखियों मे रंग नया, अधरों पे लालीबिन छुए गुलाल लाल, गाल गए रंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखीऐसा है रंग सखि धोऊँ न छूटेरातें सुहानी लगें दिन भी अनूठेबौराए मन मोरा बिना पिए ही भंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखी..
सपने में रंग गई कान्हा के रंगतन में तरंग उठें, उर में उमंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखीनयनों की वर्षा से भीगी मैं सारीनेह पिचकारी कान्हा बार-बार मारीतन के तार झनझनाएँ, नाचे अंग-अंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखीफागुन के गुन बतलाऊँ कैसे मैं आलीअँखियों मे रंग नया, अधरों पे लालीबिन छुए गुलाल लाल, गाल गए रंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखीऐसा है रंग सखि धोऊँ न छूटेरातें सुहानी लगें दिन भी अनूठेबौराए मन मोरा बिना पिए ही भंग सखिसपने में रंग गई कान्हा के रंग सखी..

लहरलहराते सागर के आँगन मेंझूमता सावन का यह मीतदक्षिण के क्षितिज से उठतेतरंगों से निकलता संगीत।चट्टानों से टकरातेउठते-गिरते, फिर उठकर खो जातेकभी मुझको खींचते तो कभी धक्के दे जातेकर रहा कोई आज हलचल।लहरों का यों गर्जना कर आनाआकर स्पर्श करना और फिर चले जानाकभी भयाक्रांत छवि दिखलाना तो कभीहारे सैनिक की भाँति लौट जाना।ऊपर भास्कर का मंद-मंद मुस्कानाऔर तभी चाँद का, शरमा कर यों चले जानाकोमल ह्रदय में स्पंदन कर देताकोई आलोक काव्य शृंखला का।

मृदंगों का नाद''
उस स्वप्न की ओरजहाँ शीतल जल के दर्पण मेंमेघों का आलिंगन होबहती धारा की कल-कल ध्वनि मेंमाधुर्यता का पदार्पण होप्रकृति के प्रेम रस मेंसुधा संगीत का गूँज होवायु का लतिका पर स्पर्शमृदुल झंकार कर रहा होघटाओं का यों आना भीसहस्त्रों मृदंगों का नाद करेआकाश की बूँद गिर करअमृत को भी गौण कर देऐसे वातावरण में मेरा विरागचित्त चकोर को ढूँढेंमुझे ऐ मेरे मन तू ले चलउस स्वप्न की ओर।
उस स्वप्न की ओरजहाँ शीतल जल के दर्पण मेंमेघों का आलिंगन होबहती धारा की कल-कल ध्वनि मेंमाधुर्यता का पदार्पण होप्रकृति के प्रेम रस मेंसुधा संगीत का गूँज होवायु का लतिका पर स्पर्शमृदुल झंकार कर रहा होघटाओं का यों आना भीसहस्त्रों मृदंगों का नाद करेआकाश की बूँद गिर करअमृत को भी गौण कर देऐसे वातावरण में मेरा विरागचित्त चकोर को ढूँढेंमुझे ऐ मेरे मन तू ले चलउस स्वप्न की ओर।

दीप सी मैं''
धूप सा तन दीप सी मैं! उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,खो रहा निज को अथक आलोक-साँसों में पिघल मनअश्रु से गीला सृजन-पल,औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल,आ रही अविराम मिट मिटस्वजन ओर समीप सी मैं!सघन घन का चल तुरंगम चक्र झंझा के बनाये,रश्मि विद्युत ले प्रलय-रथ पर भले तुम श्रांत आये,पंथ में मृदु स्वेद-कण चुन,छाँह से भर प्राण उन्मन,तम-जलधि में नेह का मोतीरचूँगी सीप सी मैं!धूप-सा तन दीप सी मैं!
धूप सा तन दीप सी मैं! उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,खो रहा निज को अथक आलोक-साँसों में पिघल मनअश्रु से गीला सृजन-पल,औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल,आ रही अविराम मिट मिटस्वजन ओर समीप सी मैं!सघन घन का चल तुरंगम चक्र झंझा के बनाये,रश्मि विद्युत ले प्रलय-रथ पर भले तुम श्रांत आये,पंथ में मृदु स्वेद-कण चुन,छाँह से भर प्राण उन्मन,तम-जलधि में नेह का मोतीरचूँगी सीप सी मैं!धूप-सा तन दीप सी मैं!

समुद्र की लहरेंकितने जोश मेंकितने वेग सेचली आतीं हैंइतराती, मंडरातीकिनारे की ओर।और रह जातीं हैंअपना सर फोड़करकिनारे की चट्टानों पर।लहर ख़त्म हो जाती हैरह जाता है-पानी का बुलबुलाथोड़ा-सा झाग।लहरें निराश नहीं होतींहार नहीं मानतीं।चली आती हैंबार-बार, निरंतर, लगातारएक के पीछे एक।एक दिन सफल होती हैंतोड़कर रख देती हैंभारी भरकम चट्टान कोपर फिर भी शांत नहीं होतींआराम नहीं करतीं।इनका क्रम चलाता रहता है।चट्टान के छोटे-छोटे टुकड़े कर चूर कर देतीं हैं-उनका हौसला, उनके निशान।बना कर रख देतीं हैंरेतएक बारीक महीन रेतसमुद्र तट पर फैलीएक बारीक महीन रेत।
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